राजस्थान की मिट्टियों के प्रकार
राजस्थान की पश्चिमी भाग की मिट्टियों में बालू की मात्रा 90 से 95 प्रतिशत तथा मटियार की मात्रा 150 से 10 प्रतिशत ।
अरावली पर्वतमाला के पूर्वी भाग में लेटेराइट . लाल , दोमट , कछारी . मध्यम काली मिट्टियां पाई जाती हैं
रेतीली बलुई ( बालू ) मिट्टी
बाडमेर , जेसलमेर , बीकानेर , चुरू , जोधपुर जालोर , पाली , नागोर एंव श्रीगंगानगर हनुमानगढ में विस्तृत
- लाल रेतीली मिट्टी- नागौर , जोधपुर , जालोर , पाली , सीकर , झुंझनू में विस्तृत
- पीली भूरो रेतीली मिट्टी- नागौर एवं पाली में विस्तृत । इसे सीरोजम मिट्टी भी कहते हैं
- खारी या नमकीन मिट्टी- जैसलमेर , बाडमेर , नागोर , बीकानेर , जोधपुर में विस्तृत ( लवणीय मिट्टी ) कच्छ के रन का भाग जो जालोर एवं बाडमेर में फैजला है जिसकी मिट्अी लवणीय है इस क्षेत्र को सांचो ( जालौर ) में नेहड कहते हैं
इस क्षेत्र में 90 से 150 सेमी की गहराई पर चूने की सतह मिलती है जिसे हार्ड – पन कहते है
लाल – पीली मिट्टी सवाईमाधोपुर , करौली , भीलवाडा , टोंक , अजमेर में विस्तृत मिट्टी का पीला रंग लौह ऑक्साइड के उच्च मात्रा के कारण ।
इस मिट्टी में ह्यूमस एवं कार्बोनेट की कमी ।
लाल – लोमी मिट्टी :- डूंगरपुर एवं उदयपुर के दक्षिणी मध्य भाग में विस्तृत । लौह ऑक्साइड की अधिकता के कारण रंग लाल होता हैं मक्के की फसल के लिए उपयोगी ।
मिश्रित लाल काली मिट्टी उदयपुर राजसमन्द भीलवाडा चितोडगढ बांसवाडा में विस्तृत । मालवा के पठार की काली मिट्जी एवं दक्षिणी अरावली की लाल मिट्शी का मिश्रण ।
मध्यम काली मिट्टो झालावाड , बूंदी , बारां , कोटा में विस्तृत ।
काली एंव कछारी मिट्टियों के मिश्रण ।। कैल्सियम और पोटाश की अधिकता । कपास , सोयाबीन , अफीम एवं संतरे की खेती के लिए उपयोगी कछारी मिट्टी ( जलोढ ) भरतपुर , धौलपुर दोसा , जयपुर , टोंक , सवाईमाधोपुर में विस्तृत । इसमें जिंक ( जस्ता ) की कमी होती हैं । इस मिट्टी का रंग हल्का लाल होता है । गेहूं चावल , कपास , जौ , जवार सरसों के लिए उपयोगी ।
भूरी मिट्टी भीलवाडा , अजमेर , टोंक एवं सवाईमाधोपुर में विस्तृत ।
भूरी रेतीली मिट्टी अलवर एवं भरतपुर श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ में विस्तृत । इसमें तीव्र जल निकासी होती हैं चूने फॉस्फोरस ह्यूमस की कमी । सरसों कपास गेहूं की फसलों के लिए उपयोगी पर्वतीय ( पथरीली ) मिट्टी सिरोही , उदयपुर , राजसमन्द , डूंगरपूर , चितोडगढ , अजमेर , भीलवाड़ा में विस्तृत ।
कृषि के लिए अनुपयुक्त ।
रासायनिक तत्वों के आधार पर पांच प्रकार
- एरिडीसोल्स ( शुष्क मिट्टी )
- अल्फीसोल्स ( जलोढ़ मिट्टी )
- एन्टीसोल्स ( पीली – भूरी मिट्टी )
- इन्सेप्टीसोल्स ( आई मिट्टी )
- वर्टीससोल्स ( काली मिट्टी ) राजस्थान में लगभग 7.2 लाख हेक्टेयर भूमि क्षारीय हैं
इसका विस्तार जोधपर , पाली . भीलवाडा . अजमेर . भरतपुर , टोक , नागौर , सिरोही , जालोर , बाडमेर चितोडगढ में है ।
क्षारीय भूमी को लवणीय , नमकीन , ऊसर एंव रेही ( रेह ) के नाम स जाना जाता हैं ऊसर भूमि को सुधारने के लिए गोबर की खाद , उडद , ग्वार या चा की फसल तथा जिप्सम ( खड्डी ) का प्रयोग किया जाता हैं मिट्टी अपरदन की समस्या वनों का विनाश , अत्यधिक पशुचारण , अविवेकपूर्ण कृषि है ।
राजस्थान में सर्वाधिक वायु अपरदन के कारण ।
आवरण अपरदन – तेज वर्षा के कारण ।
धरातली अपरदन- जल के तेज बहाव के कारण
नलीनुमा अपरदन – सर्वाधिक हानिकारक अपरदन | कोटा , सवाई माधोपुर , करौली , धौलपुर में ।
वात ( वायु ) द्वारा अपरदन- तेज हवा के कारण ।
इस हेतु 1959 में central Arid Zone Research Institute ( CAZRI ) की स्थापना जोधपुर में की गयी ।
राजस्थान में कहीं कहीं सिंचाई के जल में कार्बोनेट की मात्रा अधिक होती हैं जिसे तेलिया पानी कहते हैं
राजस्थान की मिट्टियों के प्रकार
- उपग्रह (Satellite)
- मकर संक्रांति (makar sankranti )
- वास्तु शास्त्र के अनुसार आय आदि का विवरण (vastu shastr ke anusar aay aadi ka vivaran )
- चंद्रगुप्त मौर्य
- बिंदुसार का इतिहास