दिल्ली की वेधशाला में यंत्र

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मिश्रित यंत्र:-

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्वपूर्णताः 

मिश्र अर्थात् मिश्रित यंत्र में पांच अलग – अलग यंत्र समाहित है । दिल्ली की वेधशाला का यह एक अद्वितीय यंत्र है । ऐसा माना जाता है कि इसका निमार्ण महाराजा सवाई जय सिंह ( द्वितीय ) के पुत्र महाराजा माधोसिंह ( 1751-68 ) ने कराया था । इस यंत्र के पाँच भाग हैं 

दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र , सम्राट यंत्र ( दो अर्धभागों में ) नियत चक्र यंत्र , कर्क राशि वलय यंत्र एवं पश्चिमी वृत्तपाद् । दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र का निर्माण जयपुर , उज्जैन , वाराणसी एवं मथुरा की वेधशालाओं में भी किया गया था । इस यंत्र में यूनानी , अरबी , हिन्दू एवं यूरोपीय खगोलीय व्यवस्थाओं का संशोधित रूप देखने को मिलता है । मित्र यंत्र की दक्षिणोवृत्ति पूर्वी दीवार पर अर्धवृत्ताकार रूप है । इसका प्रयोग आकाशीय पिण्डों की उँचाई मापने के लिये किया जाता था । सूर्य की उँचाई मापने का यह सर्वोत्तम यंत्र है । 

नियत चक्र अर्थात स्थिर वृत्तखण्ड मिश्र यंत्र के मध्य में स्थित है । यंत्र के केन्द्रीय शक्नु के दोनों ओर चार अर्धवृत्ताकार मापक है । यह मापक विभिन्न डिगियों पर शिरोबिन्दु समतल पर झुके हुये है । चूंकि दिन के समय पिण्ड पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर गतिमान होते है अतः इस यंत्र का प्रयोग किसी भी पिण्ड के कुछ घण्टों के अन्ताराल में झुकाव को मापने में किया जाता था । नियत चक्र का अभिप्राय पृथ्वी पर चार भिन्न स्थानों जापान में नोटकी , पिक द्विप , रवीट्जरलैंड के ज्यूरिख और इंगलैण्ड में ग्रीनविच के देशान्तर वृत्त की व्याख्या को दोहराता है ।

 कर्क राशिवलय अर्थात कर्क को चिन्हित करने वाला वृता मिश्र यंत्र की उत्तरी भिरित पर वृहद अर्धवृत्ताकार रूप में विभक्त है । इसकी दीवार लम्बरूप में 5 सीधी झुकी हुई है तथा कर्क रेखा के तल के समानान्तर है ! 21 जून को जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है तो दोपहर में किरणें इस यंत्र को स्पर्श करती है । इसका प्रयोग खगोलीय पिण्ड जैसे चन्द्रमा की देशान्तर बिन्दू के मध्याहन पर होता है । इस यंत्र से बहुत सूक्ष्गताओं से माग किया जा सकता है ।

 मिश्र यंत्र का सम्राट यंत्र दो समान भागों में विभक्त्त कारके निर्मित किया गया है । इसका प्रयोग अपराहन से पहले और बाद के समय की रिवति का अध्ययन करने के लिये किया जाता था । इसका प्रयोग स्थानीय समय के निर्धारण के लिये भी किया जाता था । मिश्र यंत्र के पश्चिमी भाग के यंत्र की पहचान अब अथवा विस्तार यंत्र के रूप में भी की जाती है ।

राम यंत्र:-

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्वपूर्णताः 

ऐसा माना जाता है कि राम यंत्र का नामकरण सवाई जय सिंह ( द्वितीय ) के दादा राजा राम सिंह के नाम पर किया गया था । दिल्ली और जयपुर की वेधशालाओं के इस अद्वितीय यंत्र के अन्वेषण का श्रेय महाराजा जय सिंह ( द्वितीय ) को जाता है । इस यंत्र के समान कोई भी यंत्र ज्ञात नहीं है 

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नापः 

दीवारों एवं स्तंभ की ऊँचाई इमारत की आन्तरिक त्रिज्या ( ( 7.51 मीटर ) के बराबर है । इसका फर्श 30 भागों में विभाजित है तथा गणना की सुविधा के लिए 0.91 मीटर ऊँचे विभाग बनाए गए हैं । प्रत्येक विभाजित भाग एवं इसका आन्तरिक खुला क्षेत्र 6 का है जो कि 360 ° पर पूर्णवृत्त बन जाता है । 

उपयोगः 

 इस यंत्र का प्रयोग आकाशीय पिण्डों , सूर्य तथा चन्द्र की | समानान्तर ( अजीमुथ ) एवं शीर्षकोण ( उन्नतांश ) की स्थिति के अध्ययन के लिये किया जाता है । इसकी गणना जयसिंह के मध्य परिशुद्धयंत्रों में की जाती है । 

कार्यः

 बेलनाकारनुमा यह यंत्र आकाश के नीचे खुली दो बड़ी इमारतों में स्थित है । यह इमारतें एक दूसरे की पूरक है । प्रत्येक इमारत के केन्द्र में स्थित स्तंभ के चारों ओर वृत्ताकार दीवार निर्मित है । दीवारें , फर्श और स्तंभ मापक रेखाओं से चिन्हित हैं । दीवारों को फर्श के समतुल्य चिन्हित किया गया है तथा इन पर खाँचों का भी प्रावधान है जिनपर आकाशीय | पिण्डों के अवलोकनार्थ शलाकाएं रखी जाती है । समतल भाग से 45 से दूरी की स्थिति में अजीमुथ कोणों को मापने के लिये , तथा दीवारों के पैमाने से 45 से अधिक दूरी की स्थिति में शिरोबिन्दु के अध्ययन के लिये किए जाते हैं ।

सम्राट यंत्र:-

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्वपूर्णताः

 यन्त्रों का सम्राट अर्थात् , सम्राट – यंत्र , दिल्ली की वेद्यशाला का सबसे वृहद् एवं प्रभावशाली यंत्र है । यह यन्त्र वर्तमान में मौजूद सभी जन्तर – मन्तरों में स्थित है । महाराजा जयसिंह द्वारा निर्मित उपकरणों में इस यंत्र को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । यह साधारण समान घण्टों वाली धूप धड़ियों में से एक है । इस यंत्र के पूर्वी भाग में एक और यंत्र उपस्थित है- षष्टमांश यंत्र । 

नापः

 इसकी ऊँचाई 20.73 मीटर तथा पूर्व – पश्चिम और उत्तर – दक्षिण माप क्रमश : 38.10 एवं 346 मीटर है । यह | यंत्र एक चतुष्कोणीय खात में निर्मित है जिसका माप पूर्व से पश्चिम 38.10 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण 36.58 मीटर है । वर्तमान में यह लगभग 3.30 मीटर गहरा है । 

उपयोगः

 इस उपकरण के माध्यम से किसी भी स्थान का सूर्य समय , स्थानीय समय और सूर्य का झुकाव जाना जा सकता है । 

कार्यः 

इस यंत्र की दीवार पृथ्वी की धुरी के समानान्तर झुकी हुई तथा इसके दोनों ओर दो अर्द्ध – वृत्ताकार खण्ड स्थित है । अर्द्ध – वृत्ताकार खण्ड भूमध्य रेखा के तल को प्रदर्शित करते हैं जो घण्टों , डिग्रियों और मिनटों से चिन्हित हैं । अर्द्ध – वृत्ताकार खण्डों पर झुकी हुई दीवार ( शंकु ) की पड़ती परछाई से किसी भी क्षण के समय की जानकारी की जा सकती है । इसके उत्तरी शंकु बिन्दु घुव की तरफ हैं जो दिल्ली के विस्तार के समान इसके क्षितिज पर 28 ° 37 ‘ का कोण बनाती है ।

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