जैन एवं बौद्ध धर्म के उदय के कारण

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जैन एवं बौद्ध धर्म के उदय के कारण

बौद्ध धर्म और जैन धर्म का उदय कब हुआ?

7वीं से 5वीं ई.पू. की अवधि के बीच के समय में एक निर्णायक मोड़ आया, जब पूरी दुनिया में बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास हुआ। इसी अवधि के दौरान भारत में जैन और बौद्ध धर्मों का पादुर्भाव हुआ। इस आंदोलन के पीछे का कारण था:

वैदिक दर्शनों का अपनी मूल पवित्रता खो देना। वैदिक धर्म बहुत जटिल हो गया तथा अंधविश्वासों, उपदेशों और अनुष्ठानों में विकृति आ चुकी थी।

ब्राह्मणों के वर्चस्व ने समाज में अशांति पैदा की तथा क्षत्रियों ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ प्रतिक्रिया व्यक्त की।

पूर्वी भारत में नई कृषि अर्थव्यवस्था का परिचय हुआ। व्यापार में वृद्धि होने के कारण, वैश्यों (व्यापारियों) के मन में

अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करने की इच्छा उत्पन्न हुई।

जैन और बौद्ध
जैन और बौद्ध

बौद्ध धर्म

गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म के प्रवर्तक) का जन्म कपिलवस्तु के शाक्य क्षत्रिय कुल में लुंबिनी (नेपाल) में 563 ई.पू. में हुआ।

उनके पिता का नाम सुद्धोधन था, जो कि शाक्य गणराज्य के एक राजा थे। उनकी माता का नाम महामाया था, जो गौतम को जन्म देने के 7 दिन बाद स्वर्ग सिधार गई। इनका पालन-पोषण गौमती नामक महिला ने किया, जो ऐसी प्रथम महिला थीं, जिन्हें बौद्ध धर्म में दीक्षा मिली। सम्राट अशोक के मशहूर रुग्मिनदेई अभिलेख में बुद्ध की स्थानीयता का जिक्र है।

बुद्ध के बाल्य अवस्था के दौरान, एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की – गौतम या तो एक महान चक्रवर्ती सम्राट होंगे या एक महान ऋषि। गौतम बुद्ध का झुकाव आध्यात्मिक जगत की तरफ होते देखकर, उनके पिता ने गौतम का विवाह अल्प आयु में ही यशोधरा (गोपा, बिम्बा, सुभद्रा, भद्रकच्छा) नामक स्त्री से कर दिया। इनके पुत्र का नाम राहुल तथा चचेरा भाई देवदत्त था।

एक जर्जर शरीरधारी वृद्ध, एक रोग ग्रस्त व्यक्ति, एक मृत व्यक्ति तथा एक संन्यासी को देखकर उनके मन में संसार के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। 29 वर्ष की आयु में, इन्होंने अपना गृह त्याग दिया। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहते हैं। जिस रथ पर सवार होकर, गौतम ने गृह त्याग किया, उसके सारथी का नाम चाण/चन्ना था तथा अश्व/घोड़े का नाम कथक था।

– सत्य की तलाश में गौतम इधर-उधर भटकते हुए, उन्होंने दो गुरु किए – आलारकलाम (योग विधि का ज्ञान दिया) तथा

रामपुत्र (उपदेशों का ज्ञान दिया)। उन्होंने कठोर वैराग्य का अभ्यास शुरू किया, जिसके अंतर्गत उन्होंने सांसारिक वस्तुओं (भोजन सहित) के अभाव के माध्यम से आत्मज्ञान पाने की कोशिश की। भोजन अत्यधिक सीमित मात्रा (प्रतिदिन एक पत्ता या एक अखरोट) लेने के कारण उनका शरीर बेहद कमजोर पड़ गया तथा एक दिन स्नान करते समय वे नदी में गिर गए और डूबने लगे। उन्हें सुजाता नामक एक महिला ने बचाया तथा भोजन कराया।

जंगल से गुजर रही नर्तकियों के गीत “वीणा के तार इतना ढीला न करो कि सुर ही न निकले और इतना कसो भी नहीं कि तार टूट जाए” से उन्हें प्रेरणा मिली। इसके बाद, एक दिन गौतम बुद्ध बोध गया पहुंचे। बहुत थक जाने के कारण, वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे आंखे बंद करके बैठ गए। 35 वर्ष की आयु में, बोधगया में 49 दिनों तक पीपल के वृक्ष के नीचे तपस्या करने के पश्चात् सर्वोच्च ज्ञान तथा बोधि की प्राप्ति हुई।

– उन्हें यह दिव्यदृष्टि प्राप्त हुई कि चरम शांति तो उनके अपने ही हृदय में है और उसे वहीं खोजा जाना चाहिए, जिसे

संबोधि कहा जाता है। तब से उन्हें बुद्ध (प्रबुद्ध व्यक्ति) और तथागत (जिसने सत्य को पा लिया) कहा जाने लगा।

गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश (धर्म प्रवर्तक चक्र) बनारस के निकट सारनाथ में दिया इस उपदेश का सार था – ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’। 483 ई.पू., उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक साल वृक्ष के नीचे (45 वर्ष की आयु), उन्हें महपरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई। (नोट: वैशाख पूर्णिमा के दिन – जन्म, ज्ञान तथा कैवल्य की प्राप्तिा)

बुद्ध ने वेदों की अलंध्यता का खंडन किया, निर्मम पशुबलि का विरोध किया, जटिल, विस्तृत तथा अर्थहीन कर्मकांडो की निंदा की, जाति प्रथा तथा पुरोहित वर्ग के प्रमुख को चुनौती दी एवं ईश्वर के बारे में अज्ञेयवादी दृश्टिकोण को अपनाया।

• उनके अधिकांश उपदेश पाली भाषा में हैं। मूल रुप से ईश्वर और आत्मा को नहीं मानते हैं, लेकिन पुनर्जन्म पर विश्वास

रखते हैं।

चार आर्य सत्य: –

विश्व दुखमय है।

प्रत्येक दुख का कोई कारण आवश्य है। जैसे तृष्णा, मोह, इच्छा, अज्ञान आदि दुख के मूल कारण हैं।

दुख के कारणो को त्यागने से ही दुख निरोध संभव है।

दुख तथा अज्ञान के निवारण का उपाय आष्टांगिक मार्ग है।

आष्टांगिक मार्ग (दुख निवारण के उपाय):

सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक उद्योग, सम्यक विचार, सम्यक समाधि।

बौद्ध धर्मग्रंथ: –

विनय पिटक:

मुख्य रूप से नियमों और विनियमों के संबंधित है, जिन्हें बुद्ध ने प्रचारित किया है। इसमें में संघ के

क्रमिक विकास का वर्णन है।

सूत्र पिटक:

इनमें मुख्यत: बुद्ध द्वारा विभिन्न अवसरों पर दिए प्रवचन हैं। इसमें सारिपुत्त, आनंद, मोगलिपुत और दूसरों

के द्वारा दिए गए कुछ प्रवचन भी शामिल किए गए हैं। यह बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का वर्णन करता है।

अभिधम्म पिटक:

यह बुद्ध की शिक्षाओं गहन दर्शन है। यह बुद्धि और पदार्थों की छानबीन तथा वस्तुओं को उनके

वास्तविक स्वरुप में समझने में मदद करता है।

दशशील (पालन करने से दुख नहीं होगा):

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, नृत्यगान, सुगंधित वस्तुएं, असामयिक भोजन, कोमल शय्या और कामिनी

कांचन आदि का त्यागा भिक्षुओं के लिए समस्त शीलों का पालन तथा गृहस्थों के लिए प्रथम पांच शीलों का पालन अनिवार्य है।

बौद्ध अनुयायी दो भागों में विभक्त था – भिक्षुक (संयासी) तथा उपासका धर्म प्रचार हेतु संघ का निर्माण किया गया, जिसके तीन अंग थे – बुद्ध (स्वयं बुद्ध), धम्म (विचारधारा) तथा संघ (संगठन)।

बौद्ध संगतियां:

संगति स्थानसमयअध्यक्षशासकघटनाएं
प्रथमराजगृह483 ई.पू. महाकश्यपअजातशत्रुबुद्ध के वचनों को 3 पिटकों (विनय पिटक, धर्मसूत्र पिटक तथा अभिधम्म पिटक) में संग्रहित किया गया।
नितीयवैशाली383 ई.पू.आचार्य सर्वकामीकालाशोकथेरवादी (विनय पिटक नियमों को न मानने वाले) तथा महासंधिक (विनय पिटक नियमों में संशोधन चाहने वाले) भिक्षुओं में संघ का विभाजन।
तृतीयपाटलिपुत्र250 ई.पूमोगलिपुत तिस्यअशोकथेरवादियों की सच्चे भिक्षुओं के रुप में स्थापना।
चतुर्थकुण्डलवन1 शताब्दीवसुमित्रकनिष्कआपसी मतभेद के कारण बौध्य धर्मावलंबी दो समुदाय (महायान तथा हीनयान) में विभक्त।

हीनयान तथा महायान में तुलना: –

  • हीनयान ने बुद्ध की शिक्षाओं के शब्दश: अनुपालन पर बल दिया, किन्तु महायान ने प्रवृत्ति तथा सत्व पर।
  • हीनायान ने संघ को केन्द्र में रखकर विकास किया, किन्तु महायान ने व्यक्तिगत इकाई को।
  • हीनयान साहित्य मुख्यतः पालि में लिखित एवं त्रिपिटकों में प्राप्य है, किन्तु महायान मुख्यतः संस्कृत में तथा सूत्रों में।
  • हीनयान बुद्ध के कार्यों के इर्द-गिर्द केन्द्रित है, किन्तु महायान उनके जीवन प्रतीकों तथा व्यक्ति से।
  • हीनयान में न्याय परायण कार्यों तथा कर्म सिद्धांत पर बल दिया, किन्तु महायान ने करुणा या सहानुभूमि सिद्धांत को कर्म सिद्धांत के ऊपर स्थान दिया।
  • हीनयान आदर्श अर्हत है जो अपनी मुक्ति की कोशिश करता है, किन्तु महायान आदर्श बोधिसत्व है जो दूसरों की मुक्ति से संबद्ध है।
  • हीनयान का प्रसार श्रीलंका, विएतनाम, लाओस, कम्बोडिया आदि क्षेत्रों तथा महायान का प्रसार भारत, चीन, जापान आदि क्षेत्रो में हुआ।

वज्रयान:

यह तंत्र व मंत्र से प्रभावित है तथा बुद्ध को एक आदर्श पुरुष बताया इनके अनुसार मुक्ति को तंत्र-मंत्र तथा जादू-टोने से प्राप्त किया जा सकता है, जिसे इन्होंने ने वज्र कहा। इसका विस्तार तिब्बत, चीन, भूटान व बंगाल तक था।

जैन धर्म –

इस धर्म के संस्थापक प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव हैं तथा 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ के समय से इस धर्म को निग्रंथ तथा

इसकी शिक्षाओ को चर्तुयाम कहा जाने लगा। महावीर स्वामी के काल से इस धर्म को जैन धर्म कहा जाने लगा। इसके दो तीर्थंकारों, ऋषभदेव तथा अरिष्थानेमी, के नामों का उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है।

 महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में 540 ई.पू. में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ (क्षत्रिय कुल), मां त्रिशला (चेटक की बहन), पत्नी यशोदा, पुत्री अनोज्जा (प्रियदर्शना) तथा दामाद जामालि था। मगध के बिंबिसार से चेटक की पुत्री चेल्लना से विवाह होने के नाते, इनका संबंध हर्यक वंश से भी था।

30 वर्ष की आयु में उनके माता-पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने गृहस्थ जीवन से संन्यास लिया। 42 वर्ष की आय मेंऋम्भिकग्राम में कैवल्य (पूर्ण सत्य ज्ञान) प्राप्ति हुई। कैवल्य प्राप्ति के कारण केवलिन, इन्द्रियों तथा शरीर के कष्टों पर विजय प्राप्ति के कारण जिन (विजेता), श्रेष्ठ कार्य करने के कारण अहर्त (पूज्य या योग्य), कठोर तपस्या तथा साधना में अटल रहने के पराक्रम के कारण महावीर नाम पड़ा। राजगृह के निकट पावापुरी में 72 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।

5 महाव्रत: सांसारिक बंधनों से मुक्त होने हेतु जैनों ने 5 महाव्रतों के पालन पर बाल दिया है: – सत्य – अहिंसा – अस्तेय (कोई चीज न चुराना) – अपरिग्रह (धन संचय न करना) – ब्रह्मचर्य इनमें से प्रथम चार महाव्रत पार्श्वनाथ के द्वारा तथा 5वां महाव्रत महावीर स्वामी द्वारा जोड़ा गया है।

महावीर के उपदेश: महावीर को द्वैध-दर्शन में विश्वास था तथा वे मात्र पदार्थ एवं आत्मा को ही मौजूद तत्व मानते थे। उनका मानना था कि पदार्थ क्षयशील है, किन्तु आत्मा शाश्वत एवं विकासमान है। उनके अनुसार कर्म की वजह से आत्मा तृष्णा जनित बंधन में कैद रहती है। सतत् प्रयायों के द्वारा ही आत्मा को कैद रखने वाली कार्मिक ताकतो से मुकाबला किया जा सकता है एवं आत्मा को तृष्णा मुक्त किया जा सकता है।

महावीर ने मोकासा प्राप्ति के साधन के रूप में त्रिरत्नो की शिक्षा दी है

सही दृष्टिकोण (सम्यक दर्शन) –

बिना किसी भ्रम के आत्मा और गैर-आत्मा में विश्वास रखना।

सही ज्ञान (सम्यक ज्ञान) –

बिना किसी संदेह या गलतफहमी के तत्वो का ज्ञान।

सही आचरण (सम्यक चरित्र) –

लगावों से मुक्त होने के नाते, एक सही आस्तिक हिंसा नहीं करता है।

जैनो ने ईश्वर का स्थान जिन के नीचे माना तथा युद्ध और कृषि को पूर्णतः वर्जित माना।

जैन परिषद:

महावीर के बाद, मगध में दो भीषण आकाल पड़ने के चलते भद्रबाहु के नेतृत्व में कुछ जैन दक्षिण चले गए और शेष स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध मे रहे। कुछ समय बाद, पाटलिपुत्र में मगध के जैनो ने एक संगिति बुलाई, जिसमें दक्षिण वाले शामिल नहीं हुए, तब से दक्षिण वाले दिगंबर और मगध वाले श्वेताम्बर कहलाए। इन दोनों के रहन-सहन तथा व्यवहारों में कुछ अंतर उत्पन्न हो चुके थे।

बौद्ध और जैन धर्म की तुलना: –

समानताएं:

दोनों ही अदेववादी पंथ थे।

दोनों ही वैदिक धर्म या ब्राह्मणवाद की कुछ प्रथाओं के विरोध में प्रतिरोधी आंदोलक थे, न कि उनके सार के विरुद्ध।

दोनों ही जाति-प्रथा के विरुद्ध थे, लेकिन उनका लक्ष्य इसे खत्म करना नहीं था, न ही वे ऐसा कर सके।

दोनों ने ही कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया।

दोनों ने ही सांसारिक जीवन के त्याग तथा मुक्ति प्राप्ति की बात की।

दोनों ही धर्मों के संस्थापक क्षात्रिय कुल के थे।

असमानताएं: →

जैनों के लिए मुक्ति प्राप्ति एक अतिवादी पथ था, वहीं बौद्धों के लिए यह मध्यम पथ था।

बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म ने अधिकाधिक अहिंसा पर बल दिया।

जैन धर्म ने गृहस्थ अनुयायियों को प्रमुखता दी, वहीं बौद्ध धर्म मुख्यतः संघ एवं मठनिवासियों पर निर्भर रहा।

जैन धर्म भारत तक सीमित रहने के बावजूद यहां जीवित रहा, वहीं बौद्ध धर्म विदेशी भूमि में प्रसार के बावजूद

अपनी जन्मभूमि से ही खत्म हो गया।

जैन धर्म ने ब्राह्मणवादी आध्यात्मिक संस्थापनाओं को भी प्रश्रय दिया, वहीं बौद्धो ने उनकी अवहेलना की।

पाशुपत/शैव धर्म –

सिंधु घाटी सभ्यता में पशुपति तथा वैदिक काल (ऋग्वेद) में रुद्र के नाम से पुज्यनीय। बाद में शिव (कल्याण) के रुप में प्रसिद्ध

एक संप्रदाय के रुप में शैव धर्म का प्रारंभ, शुंग-सातवाहन काल से हुआ। हरिहर के  रुप में शिव एवं विष्णु की मूर्तियों का निर्माण गुप्तकाल से आरंभ हुआ। शैव संप्रदायों का सर्वप्रथम उल्लेख, पंतजलि के महाभाष्य में शिव भागवत के नाम से हुआ।

वामन पुरान में शैव संप्रदाय के 4 वर्ण बताए गए हैं: –

शैव – इसके अनुसार शिव कर्ता, कारण शक्ति तथा उत्पादन बिन्दु है।

पाशुपत – यह शैव मत का प्राचीनतम संप्रदाय है, जिसके संस्थापक लकुलीश तथा नकुलीश हैं।

कापालिक – इस संप्रदाय के इष्टदेव भैरव (शंकर के अवतार) तथा मुख्य केन्द्र स्थान श्री शैल है।

कालामुख – इसके अनुयायी कापालिक वर्ग के थे, किंतु वे उनसे भी अतिवादी प्रकृति के थे।

नयनार/आडियार – दक्षिण भारत के शिव संता

भागवद्/ वैष्णव धर्म

छान्दोग्य उपनिषद में श्रीकृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख किया गया, जिसके अनुसार कृष्ण देवकी पुत्र तथा ऋशि घोरांगिरस के शिष्य हैं।

इस धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण (वृष्णि वंशीय यादव कुल) हैं। इस धर्म का उद्भव मौर्योत्तर काल से हुआ। इस धर्म के मुख्य तत्व – भक्ति एवं अहिंसा हैं।

श्री विष्णु के 24 अवतार हुए तथा भगवद्गीता में 10 अवतार की संकल्पना की गई है। भागवद् से वैष्णव नाम का प्रचलन

5वीं सदी के मध्य से आरंभ हुआ।

5 वृष्णि वीरों की पूजा का प्रचलन गुप्तकाल से हुआ: – वासुदेव (कृष्ण) – संकर्षण (वलराम) (वासुदेव-रोहिनी) – प्रद्युम्न (कृष्ण-रुकमणी) • साम्ब (कृष्ण-जामवती) – अनिरुद्ध (प्रद्युम्न के पुत्र)

अलवार – दक्षिण भारत के वैष्णव संता

जैन एवं बौद्ध धर्म के उदय के कारण

मराठा साम्राज्य का इतिहास

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